Thursday, 29 August 2013


सुनो वर्तिका ....
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 इक बेवजह सी ढलती सांझ में !
संझा-वाती की धूमिल उजास में !
मैं आज फिर उदास हूँ.. वर्तिका’ ,
फिर मेरे आओ प्रेमिल परास में !!

प्यासी रूहों की परिभाषा बाँध दो !
या जिस्मो की मर्यादा लांघ दो !
मैं आज फिर उदास हूँ ..वर्तिका’ ,
पास आओ मुझे प्रेम के उतांग दो !!

मेरी नींद की गहरी झीलों में उतरो !
गांधर्वी स्मित से मेरी चेतना हरो !
मैं आज फिर उदास हूँ ..वर्तिका’,
ठहर जाओ लहू में वेदना में उतरो !!

रंगों से भरी नदी बन बहा ले जाओ !
तट बंधों को तोड़ दो धेन हो जाओ !
मैं आज फिर उदास हूँ ...वर्तिका’,
धधकती रेत में गिरो तुहिन हो जाओ !!

धौंकनी बनो उष॒ण सुवासित श्वास की !
प्रणय से पगलाए पपीहे की आस की !
मैं आज फिर उदास हूँ ....वर्तिका’,
टेर राधा की बनो धुन मालकौस की !!

इक बेवजह सी ढलती सांझ में !
संझा-वाती की धूमिल उजास में !

मैं आज फिर उदास हूँ..
वर्तिका’ ,
 (डॉ.लक्ष्मी कान्त शर्मा )



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