सुनो ‘वर्तिका’ ....
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इक बेवजह सी ढलती सांझ में !
संझा-वाती की धूमिल उजास में !
मैं आज फिर उदास हूँ.. ‘वर्तिका’ ,
फिर मेरे आओ प्रेमिल परास में !!
प्यासी रूहों की परिभाषा बाँध दो !
या जिस्मो की मर्यादा लांघ दो !
मैं आज फिर उदास हूँ ..‘वर्तिका’ ,
पास आओ मुझे प्रेम के उतांग दो !!
मेरी नींद की गहरी झीलों में उतरो !
गांधर्वी स्मित से मेरी चेतना हरो !
मैं आज फिर उदास हूँ ..‘वर्तिका’,
ठहर जाओ लहू में वेदना में उतरो !!
रंगों से भरी नदी बन बहा ले जाओ !
तट बंधों को तोड़ दो धेन हो जाओ !
मैं आज फिर उदास हूँ ...‘वर्तिका’,
धधकती रेत में गिरो तुहिन हो जाओ !!
धौंकनी बनो उष॒ण सुवासित श्वास की !
प्रणय से पगलाए पपीहे की आस की !
मैं आज फिर उदास हूँ ....‘वर्तिका’,
टेर राधा की बनो धुन मालकौस की !!
इक बेवजह सी ढलती सांझ में !
संझा-वाती की धूमिल उजास में !
मैं आज फिर उदास हूँ..
‘वर्तिका’ ,
(डॉ.लक्ष्मी कान्त शर्मा )

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