Thursday, 29 August 2013


एक सहमी सी शाम

दबे पाँव आएगी

हाईवे पर दौड़ते ट्रक॒स और 

हेडलाइट्स की चिंघाड़ती रौशनी में
  
दम तोड़ जाएगी


मुझे फिर यादों के

उसी बियाबान में छोड़ जायेगी

हौसला अब तो

यह भी कहने का नहीं मेरा

वो किसी रोज़ लौट आएगी


और

किसी विकलांग मौन के

नपुंसक सम्मोहन में पड़ी तुम

कैसे मेरे साथ चल पड़ी तुम


मोमबत्ती की मानिंद

रात भर जली तुम, क्या

इतना मोम जमा कर पाओगी

कि मेरी रूह जो इन दिनों

खुली आँखों देख रही है


तुम्हारे संग के

संग मरमरी सपने

उन आंखों को, उस मोम से भर पाओगी


और

सुदूर पूरब की हवाओं के साथ

बह कर आ रही

तुम्हारी साँसों की वो रंगीन तितलियाँ

कैसे मेरे ज़ख़्मी सीने से उड़ा पाओगी

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मित्ती बोलो ...
कब तक इन कविताओं का आडम्बर रचता रहूँ
हाँ मैं चाहने लगा तुमको ये कहने से बचता रहूँ

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(डॉ.लक्ष्मी कान्त शर्मा )


















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